किसी साइंस फिक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लगने वाला यह कारनामा दक्षिण कोरिया के शोधकर्ताओं ने हकीकत में कर दिखाया है। उन्होंने एक ऐसा तरीका ईजाद किया है जिससे चूहों के शरीर के अंदर मौजूद खास जीन्स (genes) को बिना किसी तार या सर्जरी के एक्टिवेट किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने उसी 60 Hz फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल किया, जो हमारे घरों के साधारण बिजली के सॉकेट में होती है। प्रतिष्ठित जर्नल Cell में प्रकाशित यह रिसर्च एक ऐसे “मैग्नेटोजेनेटिक” (magnetogenetic) स्विच की शुरुआत है, जो बीमारियों के इलाज और शरीर के कामकाज को समझने के तरीके को पूरी तरह बदल सकता है।
Korea Advanced Institute of Science and Technology (KAIST) की इस टीम ने इस इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड सेटअप के जरिए कुछ ऐसे जैविक कारनामे किए हैं जो हैरान कर देने वाले हैं। उन्होंने बूढ़े चूहों में उन जीन्स को सक्रिय किया जो ‘एपिजेनेटिक रिप्रोग्रामिंग’ (epigenetic reprogramming) को ट्रिगर करते हैं। नतीजा? उन चूहों की उम्र बढ़ गई और उनके शरीर के अंगों में बुढ़ापे के लक्षण कम होने लगे। एक अन्य प्रयोग में, उन्होंने बूढ़े चूहों के दिमाग में खास तौर पर म्यूटेंट अमाइलॉइड (amyloid) जीन्स को चालू किया, जिससे अल्जाइमर रोग का अध्ययन करना आसान हो गया। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लिए न तो किसी दवा की जरूरत पड़ी और न ही किसी इम्प्लांट की—बस एक सटीक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड ने सारा काम कर दिया।
इस ‘बायोलॉजिकल रिमोट कंट्रोल’ के पीछे का विज्ञान जितना जटिल है, उतना ही दिलचस्प भी। कम फ्रीक्वेंसी वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड को Cytochrome b5 type B (CYB5B) नाम का एक प्रोटीन पकड़ लेता है। यह हलचल कोशिका के कैल्शियम चैनल्स को खोल देती है, लेकिन यह कोई बेतरतीब बहाव नहीं होता। इसके बजाय, यह कैल्शियम आयनों की एक खास लयबद्ध पल्स (rhythmic pulses) पैदा करता है। यही खास लय SP7 नाम के एक ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर को सक्रिय करती है, जो सीधे DNA से जुड़कर टारगेट जीन को ‘ऑन’ कर देता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि अगर कोशिका को सिर्फ कैल्शियम से भर दिया जाए, तो कोई असर नहीं होता; वह खास ‘रिदम’ या लय ही इस ताले की असली चाबी है।

यह खोज इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
बायोलॉजिकल कंट्रोल की दिशा में यह रिसर्च एक बहुत बड़ी छलांग है। अब तक ‘ऑप्टोजेनेटिक्स’ (optogenetics) जैसी तकनीकों का बोलबाला था, जिसमें रोशनी के जरिए कोशिकाओं को कंट्रोल किया जाता है। लेकिन उसमें एक बड़ी दिक्कत है—रोशनी को शरीर की गहराई तक पहुँचाने के लिए अक्सर शरीर के अंदर फाइबर ऑप्टिक इम्प्लांट डालने पड़ते हैं। इसके उलट, मैग्नेटोजेनेटिक्स (Magnetogenetics) में इस्तेमाल होने वाली लो-फ्रीक्वेंसी किरणें बिना किसी नुकसान के शरीर के पार जा सकती हैं। इससे भविष्य में ऐसी थैरेपी का रास्ता साफ होता है, जिन्हें शरीर के बाहर रखे एक डिवाइस से जब चाहें शुरू या बंद किया जा सकेगा।
कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाने से लेकर शरीर के अंगों को फिर से जवान करने तक, इस तकनीक की संभावनाएं असीमित हैं। हालांकि इंसानों पर इसके इस्तेमाल में अभी वक्त लगेगा, लेकिन यह रिसर्च वैज्ञानिकों को एक ऐसा जादुई स्विच थमाती है जिससे हमारी बायोलॉजी को कंट्रोल करना बिजली का बटन दबाने जितना आसान हो सकता है। आप इस पूरे रिसर्च पेपर को Cell में पढ़ सकते हैं: A wirelessly controlled magnetogenetic gene switch for non-invasive programming of longevity and disease।

