Robeauté का चावल जैसा नन्हा रोबोट अब दिमाग में करेगा सर्जरी

जहाँ एक तरफ ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) सुर्खियां बटोरने में मशगूल हैं, वहीं पेरिस की मेडटेक कंपनी Robeauté न्यूरोसर्जरी की दुनिया में कुछ ऐसा कर रही है जो शायद कहीं ज्यादा व्यावहारिक और क्रांतिकारी है: चावल के एक दाने के बराबर का एक नन्हा, स्टीयरेबल (रास्ता बदलने में सक्षम) रोबोट। महज 1.8 मिलीमीटर लंबा यह स्व-चालित (self-propelled) माइक्रो-रोबोट दिमाग की उन गहराइयों तक पहुँचने का दम रखता है जहाँ आज के सीधे और सख्त सर्जिकल औजार चाहकर भी नहीं पहुँच सकते। यह तकनीक ब्रेन ट्यूमर और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज में एक नए युग की शुरुआत कर सकती है। इस स्टार्टअप ने हाल ही में $28 मिलियन की सीरीज़ A फंडिंग जुटाई है ताकि साइंस फिक्शन जैसे लगने वाले इस कॉन्सेप्ट को क्लीनिकल हकीकत में बदला जा सके।

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Robeauté का असली इनोवेशन इसका मॉड्यूलर डिज़ाइन है, जो इसे दिमाग की बेहद नाजुक संरचनाओं के बीच घुमावदार रास्तों पर चलने की काबिलियत देता है। यह मौजूदा न्यूरोसर्जरी की उस सबसे बड़ी कमी को दूर करता है जहाँ सर्जन केवल उसी हिस्से तक पहुँच पाते हैं जो एंट्री पॉइंट से बिल्कुल सीधी रेखा में हो। रोबोटिक्स के दिग्गज Bertrand Duplat ने इस मिशन की सह-स्थापना की थी, और इसके पीछे उनकी एक निजी और भावुक वजह थी—उनकी माँ का ग्लियोब्लास्टोमा (एक घातक ब्रेन ट्यूमर) से संघर्ष, जिसे डॉक्टरों ने ‘इनऑपरेबल’ करार दे दिया था। कंपनी का लक्ष्य सर्जनों को एक ऐसा हथियार देना है जो अभूतपूर्व सटीकता (precision) के साथ काम कर सके। इस प्लेटफॉर्म का पहला इस्तेमाल एडवांस्ड ट्यूमर बायोप्सी के लिए किया जाएगा, जबकि भविष्य में इसके जरिए सीधे ट्यूमर वाली जगह पर दवाइयाँ पहुँचाने और इलेक्ट्रोड इम्प्लांट करने की योजना है। जानवरों पर सफल परीक्षण के बाद, Robeaute अब 2026 में इंसानी ट्रायल (first-in-human trials) शुरू करने की तैयारी कर रहा है।

यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

आज की न्यूरोसर्जरी एक बेहद जोखिम भरा क्षेत्र है, जहाँ सुइयों और प्रोब्स की ‘सीधी रेखा’ में चलने की मजबूरी दिमाग के कई हिस्सों को ‘नो-गो ज़ोन’ बना देती है। मिलीमीटर के आकार का यह मुड़ने वाला रोबोट इस पुराने ढर्रे को पूरी तरह बदल सकता है। उन ट्यूमर तक पहुँचकर, जिन्हें अब तक छूना भी नामुमकिन था, यह तकनीक सटीक डायग्नोसिस और लोकल ट्रीटमेंट को मुमकिन बनाएगी। यह दुनिया भर के उन एक अरब से ज्यादा लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जो दिमाग की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। असल में, यह सिर्फ दिमाग को ‘पढ़ने’ की तकनीक नहीं है, बल्कि मरीज के बचने की उम्मीद को फिर से लिखने (rewriting a patient’s prognosis) की कोशिश है।