अभी कुछ समय पहले तक, ड्रोन ‘स्वार्म’ (drone swarm) टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा कारनामा आसमान में होने वाली रंगीन रोशनियों का खेल माना जाता था। चीन के लियुयांग में, High Great Technology नाम की एक कंपनी ने एक ही कंप्यूटर से 15,947 ड्रोन लॉन्च कर एक साथ सबसे अधिक मानव रहित हवाई वाहनों (UAVs) के उड़ने का नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। यह AI-आधारित तालमेल का एक हैरतअंगेज प्रदर्शन था—रात के अंधेरे में रोशनियों का एक खूबसूरत और मासूम बैले। लेकिन जब दुनिया इस चकाचौंध पर तालियां बजा रही थी, तब यही तकनीक पर्दे के पीछे एक बेहद खौफनाक मंजर की तैयारी कर रही थी।
वही AI, जो 15,000 ड्रोन्स को आपस में टकराकर महंगे कचरे में बदलने से रोकता है, अब हथियारों को उनके सटीक निशाने तक पहुंचा रहा है। मनोरंजन के लिए कोरियोग्राफ किए गए इन ड्रोन्स का स्वायत्त युद्धक विमानों (autonomous combat drones) में तब्दील होना कोई धीमी प्रक्रिया नहीं रही है, बल्कि यह एक ‘वर्टिकल क्लाइंब’ जैसा है। हवाई ताकत (air superiority) हासिल करने की जो बाधा कभी अरबों डॉलर और पायलटों की दशकों की ट्रेनिंग से पार की जाती थी, वह अब चंद माइक्रोचिप्स और कुछ स्मार्ट कोड की बदौलत धराशायी हो गई है। पेंडोरा का पिटारा सिर्फ खुला ही नहीं है, बल्कि उसके अंदर का बारूद मैदान-ए-जंग में तैनात भी हो चुका है।
जब ‘स्वार्म’ शिकारी बन गया
लाइट शो से सीधे युद्ध के मैदान तक का यह सफर सिर्फ किताबी नहीं था। लियुयांग में जो तालमेल दिखा, वही बुनियादी सिद्धांत झेजियांग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भी आजमाया, जहां ड्रोन्स का एक झुंड बिना किसी मानवीय पायलट के घने जंगलों के बीच से अपना रास्ता खुद तलाशने में कामयाब रहा। यह सिर्फ टक्कर से बचने (collision avoidance) के बारे में नहीं है; यह एक जटिल और अस्थिर माहौल में सामूहिक रूप से, खुद फैसले लेने (autonomous problem-solving) की क्षमता है। अब जरा सोचिए, उन पेड़ों की जगह दुश्मन का एयर डिफेंस सिस्टम हो और नेविगेशन पॉइंट्स की जगह उनके ठिकाने।
यहीं से शुरू होता है अगला तार्किक और डरावना कदम: दोबारा इस्तेमाल होने वाले हथियारबंद ड्रोन। हाल ही में सामने आए एक वीडियो में चीन निर्मित एक हेक्साकॉप्टर को मशीन गन से लैस देखा गया। कमाल इस बात का नहीं है कि ड्रोन पर हथियार लगा है—बंदूक तो कोई भी बांध सकता है। असली जादू इसके सॉफ्टवेयर में है। जब ड्रोन गोली चलाता है, तो उसका जबरदस्त झटका (recoil), जो किसी भी हल्के विमान को हवा में अनियंत्रित कर सकता है, उसे फ्लाइट कंट्रोलर पलक झपकते ही सोख लेता है। इसका स्टेबलाइजेशन इतना सटीक है कि ड्रोन अपने निशाने पर लॉक रहता है और अगले शॉट के लिए तैयार रहता है।

यह अब केवल एक ‘लोइटरिंग मुनिशन’ (loitering munition) या एकतरफा सुसाइड ड्रोन नहीं रह गया है। यह दोबारा इस्तेमाल होने वाली, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस ‘फ्लाइंग इन्फैंट्री’ (flying infantry) है। जब एक 2,000 डॉलर की यूनिट, जिसका निशाना अचूक है, जिसे मौत का डर नहीं और जिसका रिकोइल कंट्रोल बेमिसाल है, बड़े पैमाने पर तैयार की जा सकती है, तो फिर इंसानी सैनिकों की ट्रेनिंग पर करोड़ों क्यों खर्च किए जाएं? युद्ध का अर्थशास्त्र पूरी तरह से बदल चुका है। आज एक 500 डॉलर का ‘DIY ड्रोन’ 82 मिलियन डॉलर के फाइटर जेट के लिए गंभीर खतरा बन सकता है—यह एक ऐसा सौदा है जिसे कोई भी पारंपरिक सेना लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं कर पाएगी।
यूक्रेन में लाइव है ‘AI किल चेन’
यह किसी भविष्य के युद्ध की कल्पना नहीं है। यह आज की हकीकत है। यूक्रेनी सेना ने रोजाना के ऑपरेशन्स में AI-पावर्ड अटैक ड्रोन्स का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। एक बार लॉन्च होने के बाद, ये ड्रोन पूरी तरह से अपने दम पर टारगेट को ढूंढ सकते हैं, ट्रैक कर सकते हैं और उसे तबाह कर सकते हैं। यह क्षमता तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब रूसी ‘इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर’ (EW) इंसानी पायलट के सिग्नल को जैम कर देता है। स्वायत्त हत्या (Autonomous killing) आधिकारिक तौर पर युद्ध का हिस्सा बन चुकी है।
ये कोई साधारण “दागो और भूल जाओ” (fire-and-forget) सिस्टम नहीं हैं। ये निम्नलिखित क्षमताओं से लैस हैं:
- टर्मिनल अटैक गाइडेंस: हमले के आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण पलों में AI कमान संभाल लेता है ताकि पायलट से संपर्क टूटने के बावजूद निशाना न चूके।
- ऑटोनॉमस टारगेट रिकग्निशन: ड्रोन्स को यह सिखाया जा सकता है कि एक टैंक या मिसाइल लॉन्चर कैसा दिखता है, जिसके बाद वे बिना किसी इंसानी इशारे के खुद उनका शिकार करते हैं।
- GPS-रहित नेविगेशन: विजुअल नेविगेशन का उपयोग करते हुए, जहां ड्रोन नीचे की जमीन की तुलना अपने ऑनबोर्ड मैप से करता है, यह भारी जैमिंग के बावजूद सैकड़ों किलोमीटर तक उड़ सकता है, जिससे पारंपरिक काउंटर-मेजर्स बेकार हो जाते हैं।
इनमें से एक प्रमुख सिस्टम है Bumblebee ड्रोन, जिसे कथित तौर पर गूगल के पूर्व CEO एरिक श्मिट से जुड़े एक प्रोजेक्ट का समर्थन हासिल है। यह ड्रोन हजारों कॉम्बैट मिशन पूरे कर चुका है। एक रिकॉर्ड किए गए हमले में, जब रूसी जैमर्स ने इंसानी पायलट वाले ड्रोन्स को रोक दिया, तब एक ‘बंबलबी’ ड्रोन ने पहले ही अपने टारगेट को लॉक कर लिया था। डेटा लिंक टूटने के बावजूद, उसने अपना रास्ता खुद तय किया और लक्ष्य को नेस्तनाबूद कर दिया। रूसी सैन्य विश्लेषकों ने बाद में स्वीकार किया कि उनके पास इसका कोई प्रभावी तोड़ नहीं है।

डिफेंस-टेक का नया ईकोसिस्टम
इस क्रांति की अगुवाई नई पीढ़ी की चुस्त डिफेंस-टेक कंपनियां कर रही हैं। NORDA Dynamics और X-Drone जैसी यूक्रेनी फर्में फ्रंट लाइन्स पर हजारों की संख्या में AI-पावर्ड सिस्टम सप्लाई कर रही हैं। NORDA Dynamics, जिसे हाल ही में 1 मिलियन डॉलर की फंडिंग मिली है, “Underdog” जैसे ऑटोनॉमी मॉड्यूल विकसित करती है जिन्हें विभिन्न UAVs में फिट किया जा सकता है। इससे वे बिना GPS या निरंतर डेटा लिंक के काम करने में सक्षम हो जाते हैं। कंपनी के शब्दों में कहें तो, वे इन मॉड्यूल्स को “हजारों की संख्या में युद्धक तैनाती” के लिए तैयार कर रहे हैं।
अब ऑपरेटर की भूमिका एक पायलट से बदलकर एक ‘मिशन कमांडर’ की हो गई है। एक अकेला व्यक्ति अब दर्जनों सेमी-ऑटोनॉमस ड्रोन्स को नियंत्रित कर सकता है, बस टारगेट असाइन करके बाकी का जटिल काम AI पर छोड़ सकता है। यह केवल ताकत बढ़ाने वाला जरिया (force multiplier) नहीं है; यह युद्ध लड़ने का एक बिल्कुल नया तरीका है।
लियुयांग के आसमान में नाचने वाली उन खूबसूरत रोशनियों ने दुनिया को कंट्रोल का एक नमूना दिखाया था। उन्होंने दिखाया कि AI-आधारित स्वार्म रोबोटिक्स पर इंसान की पकड़ कितनी मजबूत हो चुकी है। अब, वही महारत युद्ध के मैदान में घातक सटीकता के साथ इस्तेमाल की जा रही है। तकनीक सिद्ध हो चुकी है, आर्थिक लाभ स्पष्ट है, और स्वायत्त ड्रोन युद्ध की पहली गोलियां चलाई जा चुकी हैं। हम एक नए और बेचैन कर देने वाले युग की दहलीज पर खड़े हैं।













